
मेरी उम्र बीस से बस कुछ ही ऊपर थी।
तब मुझे लगता था कि मैं बड़ा हो चुका हूँ।
मैं नौकरी करता था। जिस स्त्री से प्रेम करता था, उससे शादी कर ली थी। मानता था कि अब अपने जीवन की ज़िम्मेदारी मुझे ख़ुद उठानी है।
पिता का कारोबार डूब गया।
उसका कर्ज़ मेरे नाम रह गया।
ग़लती मैंने नहीं की थी। लेकिन इससे मेरे सामने खड़ी हक़ीक़त नहीं बदली।
परिवार बिखर गया। सबको अलग-अलग जगह छिपना पड़ा, और उनकी देखभाल करना भी मेरे हिस्से आया।
मुझे नहीं मालूम था कि मदद के लिए किसके पास जाऊँ।
शायद दफ़्तर में किसी अनुभवी सहकर्मी से पूछ सकता था। किसी वकील के पास भी जा सकता था।
लेकिन तब मेरे मन में यह भी नहीं आया कि ऐसे रास्ते भी हैं।
मुझे विश्वास था कि ज़िम्मेदारी मुझे ही उठानी है।
मेरे सिवा कोई और नहीं।
एक दिन चावल का डिब्बा ख़ाली हो गया। इंस्टैंट नूडल्स भी ख़त्म थे।
जिस स्त्री से प्रेम करता था, उसके साथ घर बसाया था, लेकिन उसके खाने का इंतज़ाम तक नहीं कर पा रहा था।
कभी नहीं सोचा था कि सन 2000 के दशक के दक्षिण कोरिया में मुझे ऐसी हक़ीक़त का सामना करना पड़ेगा।
गहरा धक्का लगा।
मैं हताश था। कोई उम्मीद नहीं दिखती थी।
फिर भी किसी से कहना नहीं चाहता था कि मैं मुश्किल में हूँ।
परिवार का हर व्यक्ति पहले से ही अपने कठिन दिनों से जूझ रहा था। अपनी पत्नी पर भी अपना बोझ नहीं डालना चाहता था।
‘भाड़ में जाए! किसी न किसी तरह कर ही लूँगा!’
भोर में अख़बार बाँटता था।
दिन में दफ़्तर जाता था।
रात को ग्राहकों को उनकी अपनी कार चलाकर घर पहुँचाने का काम करता था।
वह काम ख़त्म करके लौटते-लौटते फिर भोर हो जाती थी।
पत्नी सो चुकी होती थी।
न आपस में बात करने का पूरा समय मिलता, न मुझे सोने का। कुछ ही देर में फिर दफ़्तर निकलना होता था।
फिर भी निकलने से पहले, रात भर की कमाई खाने की मेज़ पर रखते वक़्त मन में एक संतोष होता था।
मुड़े-तुड़े नोट।
पत्नी ने बताया था कि हर सुबह उन पैसों को देखकर उसकी आँखों में आँसू आ जाते थे।
वे दुख और तकलीफ़ के दिन थे, लेकिन इतनी कम उम्र में मुझे किसी तरह परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने की कोशिश करते देखकर उसे हमारे साथ जीने की उम्मीद मिलती थी।
उसके मन की यह बात मैंने बहुत बाद में सुनी।
तब तो मैं बस मेज़ पर पैसे रखता और एक और दिन शुरू कर देता था।
एक बार कर्ज़ की वसूली करने वालों ने मुझे ज़बरदस्ती कार में बिठाया और पीटा भी था।
ऐसा कुछ, जो सिर्फ़ फ़िल्मों में होता लगता था।
उस पल भी डर से पहले एक ख़याल आया था।
परिवार को मुझे इस हाल में नहीं देखने देना है।
जल्द से जल्द इस जकड़ से निकलना है।
बस यही।
तब डरने की भी फ़ुर्सत नहीं थी।
सामने आ खड़ी हुई मुश्किलों को सुलझाने में लगा रहता था।
सब कुछ सँभालने, टिके रहने और किसी तरह जीवन चलाते रहने से फ़ुर्सत ही नहीं थी।
तब मुझे लगता था, ज़िम्मेदारी इसी को कहते हैं।
किसी का सहारा न लेना। मुश्किल में होने की एक बात भी ज़बान पर न लाना।
अब सोचता हूँ तो वह जवानी का अभिमान था। यह अहंकार कि मैं अकेला ही सब कुछ सँभाल सकता हूँ।
लेकिन तब मैं बहुत छोटा था।
यह भी नहीं जानता था कि मदद माँगी जा सकती है।
मुश्किल में था तो कह सकता था कि मुश्किल में हूँ।
किसी का सहारा ले सकता था।
तब मैं ऐसा नहीं कर पाया।
अगर आज का मैं उस समय में लौट सकता, तो शायद उस युवक के सामने कुछ देर खड़ा रहता।
बीस से कुछ ही ऊपर की उम्र का वह युवक, जो ख़ुद को बड़ा समझता था।
जो किसी से एक बार भी नहीं कह पाया कि वह मुश्किल में है।
अपने उस कम उम्र के रूप पर मुझे दया आती है।
अकेले ही यूँ टिके रहने की कोशिश करते उस लड़के के लिए मन दुखता है।
मैं उसे चुपचाप गले लगा लूँगा।
बिना कुछ कहे, बहुत देर तक।
और मन ही मन उससे कहना चाहता हूँ।
कोई बात नहीं।
कोई बात नहीं।
इसमें तुम्हारी ग़लती नहीं है।
ब्रंच स्टोरी के लेखक येओउन · ब्रंच स्टोरी पर इस रचना का कोरियाई मूल पाठ पढ़ें
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