चाँदनी के नीचे, हम तीन

साँझ के रंगों से भरे समुद्र और पहाड़ियों के ऊपर अर्धचंद्र, बाईं ओर एक सड़क की बत्ती।

वाह, चाँदनी कितनी उजली है।

मैंने सिर उठाकर आसमान की ओर देखा।

मेरी उम्र शायद छह या सात साल रही होगी। उस रात मैं दादा-दादी के साथ कस्बे से लौट रहा था।

बस से उतरकर हम घर की ओर जाती कच्ची सड़क पर चल रहे थे। रास्ते में एक भी लैम्पपोस्ट नहीं था, मगर उस दिन चाँदनी की बदौलत सड़क के किनारे का जंगल और खेत धुँधले से दिखाई दे रहे थे।

मेरी बचपन की आँखों को वह चाँद कुछ ज़्यादा ही बड़ा और चमकीला लगा था। रास्ता और खेत, जो अक्सर अँधेरे में डूबे रहते थे, और दादा-दादी की आकृतियाँ भी उस दिन हल्की-हल्की उभर आई थीं।

हवा चली।

रास्ते के किनारे उगे फर और बलूत के पेड़ों की पत्तियाँ हिलने लगीं। जब भी पत्तियाँ एक-दूसरे से छूतीं, एक मुलायम सरसराहट उठती।

हर कदम पर पैरों के नीचे सूखे पत्ते चरमराते।

कहीं झींगुर बोल रहा था। एक छोटे उल्लू की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी।

जंगल और गिरे हुए पत्तों की गंध के बीच बबूल के फूलों की हल्की सुगंध तैर रही थी। कहीं से जलती लकड़ियों की महक उसमें घुल आती, और सड़क किनारे खेत से मिट्टी और खाद की गंध उठती।

दादा जी थोड़ा आगे चल रहे थे और मैं उनके बगल में था। दादी हमसे कुछ पीछे चल रही थीं।

दादा जी वैसे भी कम बोलते थे। उस दिन हमने क्या बात की थी, याद नहीं।

हमने एक-दूसरे का हाथ नहीं पकड़ा था। अपनी-अपनी चाल से एक ही रास्ते पर चले थे।

फिर भी मुझे ज़रा भी डर नहीं लगा।

क्योंकि दादा-दादी मेरे साथ थे।

उस दिन घर पहुँचने का दृश्य याद नहीं। बस से उतरने के बाद कितनी दूर चले थे, या उस रात और क्या हुआ था, यह भी याद नहीं।

मेरी स्मृति हमेशा उसी रास्ते पर ठहर जाती है।

उस दृश्य पर, जहाँ एक बड़े से पूरे चाँद के नीचे तीन लोग साथ चल रहे थे।


आज भी मुझे रात में चलना अच्छा लगता है।

चाँदनी भरी रात में कभी-कभी मैं आसमान की ओर देखता हूँ। झींगुर की आवाज़, हवा में पत्तों की सरसराहट या अचानक चली आने वाली बबूल की महक से भी उन दिनों का वह रात का रास्ता याद आ जाता है।

तब अनायास ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।

परिवार को भी मैंने कई बार यह बात बताई है। कहा है कि यह मेरे बचपन की सबसे सुखद यादों में से एक है।

जिस साल मैंने हाई स्कूल पूरा किया, दादी चल बसीं। दादा जी तब गए जब मेरी उम्र तीस से कुछ ऊपर थी।

उस सुखद स्मृति को याद करने के थोड़ी देर बाद उनकी कमी महसूस होने लगती है।

यादों में अब भी तीन लोग चल रहे हैं।

अपनी-अपनी चाल से, फिर भी साथ-साथ।

बीते दिनों को शब्दों और तस्वीरों में सँजोता हूँ।
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