
“जोंगशिक! जोंगशिक! मेरे हाथ-पाँव नहीं हिल रहे! नहीं हिल रहे!”
मैं भारत के एक विश्वविद्यालय अस्पताल के आपातकालीन कक्ष में बिस्तर पर लेटा था।
हृदय गति मापने की मशीन और ऑक्सीजन लगी हुई थी, फिर भी मेरी साँस फूल रही थी। मैं ऐसे हाँफ रहा था जैसे अभी-अभी मैराथन पूरी की हो।
हाथों और पैरों की उँगलियों के सिरों से संवेदना गायब होने लगी।
मानो सुन्न करने वाला इंजेक्शन लगा हो, वह सुन्नपन धीरे-धीरे धड़ तक फैलने लगा। मैंने उँगलियाँ हिलाने की कोशिश की, पर वे नहीं हिलीं।
मैंने अपने हमउम्र सहकर्मी जोंगशिक को पुकारा।
जोंगशिक मेरे हाथ-पैर मलने लगा। बिस्तर के आसपास कंपनी के स्थानीय प्रमुख और साथ काम करने वाले दूसरे प्रवासी कर्मचारी खड़े थे। सबके चेहरों पर चिंता और हैरानी थी।
मेरी पलकें भारी होने लगीं। चेतना धीरे-धीरे धुँधला रही थी और आँखें बंद होती जा रही थीं।
मुझे लगा, एक बार आँखें बंद हुईं तो फिर कभी नहीं खुलेंगी।
ऐसा डर मैंने जीवन में पहली बार महसूस किया था।
मैंने किसी तरह आँखें खुली रखने की कोशिश की, मगर पलकें धीरे-धीरे झुकती गईं।
तभी अतीत के दृश्य मेरी आँखों के सामने प्रोजेक्टर की फिल्म की तरह तेजी से गुजरने लगे।
शायद मैंने अपना बचपन देखा था।
अपनी नवजात बेटी की छवि, उसका घुटनों के बल चलना और पहली बार खड़े होना।
और फिर मेरे बेटे को गोद में लिए मेरी पत्नी, बेटा खिलखिलाकर मुस्कुरा रहा था।
ठीक-ठीक याद नहीं कि कौन-से दृश्य किस क्रम में गुजरे थे। सब कुछ एक पल में हो गया था।
मुझे लगा, शायद मैं अपने परिवार को फिर कभी नहीं देख पाऊँगा।
मैं डरा हुआ था और दुखी भी।
आँखें बंद न हों, इसके लिए मैं आखिरी क्षण तक जूझता रहा।
लेकिन आखिरकार आँसू बहते महसूस हुए और मेरी आँखें बंद हो गईं।
जब दोबारा आँखें खुलीं, मैं अस्पताल के कमरे में था।
पता नहीं एक दिन बीता था या दो।
आँखें बंद होने से पहले के वे नाजुक क्षण भी मुझे याद नहीं आ रहे थे।
मैंने बस रोज की तरह, बिना कुछ महसूस किए आँखें खोल दीं।
जोंगशिक मेरे पास था। वह मेरे जागने से ही वहाँ था या बाद में आया, मुझे याद नहीं।
यह काम पर जाने के बजाय यहाँ क्यों बैठा है?
शायद जोंगशिक ने मुझसे पूछा था कि क्या मुझे पिछले दिन की बात याद है।
मगर उस समय मेरी नजर तकिए के पास कतार में चल रही चींटियों पर जा पड़ी।
मैं घबरा उठा और नर्स से कमरा बदलने को कहा।
कमरे की सुविधाएँ अच्छी नहीं थीं। मुझे लगा मेरा शरीर अब ठीक है और मैं जल्द से जल्द छुट्टी लेकर घर जाना चाहता था।
समय बीतने के साथ मुझे धीरे-धीरे समझ आया कि मेरी हालत कितनी गंभीर थी।
बाद में मुझे यह भी बताया गया कि बेहोशी के दौरान मेरा दिल रुक गया था और मुझे मृत घोषित कर दिया गया था। वास्तव में क्या हुआ था, यह मैं ठीक-ठीक नहीं जान पाया।
लेकिन शरीर ठीक लगने का मतलब यह नहीं था कि मन की आशंका भी मिट गई थी।
पता नहीं था कि कब फिर साँस फूलने लगेगी या हाथ-पैरों की संवेदना गायब हो जाएगी।
उस समय कोरोना महामारी के कारण कोरिया जाने की उड़ान मिलना मुश्किल था। बड़ी मुश्किल से मध्य पूर्व होते हुए एक विमान में बैठकर मैं कोरिया पहुँचा।
लेकिन मुझे तुरंत देश में प्रवेश नहीं मिल सका।
मैं कोरोना के कारण अस्पताल में भर्ती रह चुका था और अब भी हल्का बुखार था। भारत से आने के कारण हवाई अड्डे पर स्वास्थ्य जाँच के दौरान मुझे उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखकर अलग कर दिया गया।
वह हवाई अड्डे के गलियारे के एक कोने में बनाया गया अस्थायी पृथक्करण कक्ष था।
मुझसे कहा गया कि कोरोना की दोबारा जाँच में नतीजा नकारात्मक आने पर ही प्रवेश मिल सकेगा। डॉक्टर के आने का इंतजार करते हुए मैं विभाजक से घिरी जगह में कई घंटे बैठा रहा।
तभी विभाजक के नीचे से एक हैमबर्गर सरकाया गया।
वह लोटेरिया का हैमबर्गर था।
भारत से बड़ी मुश्किल से कोरिया पहुँचा था, और अब हवाई अड्डे के एक कोने में अलग-थलग बैठा, विभाजक के नीचे से मिला हैमबर्गर खा रहा था।
मैं हक्का-बक्का था।
बस यही इंतजार था कि जल्द से जल्द प्रवेश की अनुमति मिल जाए।
आखिरकार कोरोना की दोबारा जाँच में नतीजा नकारात्मक आया और मुझे प्रवेश की अनुमति मिल गई।
लेकिन मैं घर नहीं जा सकता था। उस समय संक्रमण रोकने के नियमों के कारण सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने की अनुमति नहीं थी; मुझे अलग वाहन से जाना था।
मेरा इलाज करने वाला अस्पताल ढूँढ़ना भी मुश्किल था।
सौभाग्य से सियोल मेट्रोपॉलिटन बोरामे अस्पताल ने मेरी जाँच की।
मैंने भारत में अपने साथ हुई घटना बताई और डॉक्टर से काफी देर तक बात की।
उन्होंने कहा कि मुझे पर्याप्त आराम करके स्वस्थ होना होगा। यह भी सलाह दी कि कुछ समय तक भारत न लौटूँ तो बेहतर होगा।
लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता था।
परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी मुझ पर थी और बच्चों को स्कूल भेजना था।
भारत में मैंने अपना समय भी लगाया था। वहाँ शुरू किया हुआ काम था और बहुत कुछ था जो मैं आगे हासिल करना चाहता था।
शरीर को लेकर अब भी आशंका थी, लेकिन मुझे लौटना ही था।
आखिरकार मैं भारत लौट गया।
कुछ महीने बीत गए।
भारत में भी कोरोना की स्थिति धीरे-धीरे सुधर रही थी।
आखिर वह दिन आ गया जब मेरा परिवार भारत लौट रहा था।
मैं चेन्नई हवाई अड्डे पर उनका इंतजार कर रहा था।
निकास द्वार पर वे चेहरे दिखाई दिए जिन्हें देखने के लिए मैं इतना तरसा था।
मुझे देखते ही बेटी और बेटा मासूमियत से मुस्कुरा उठे।
पत्नी भी मुस्कुरा रही थी। लेकिन उसका चेहरा ऐसा लग रहा था मानो वह मुस्कुराते हुए भी रो रही हो।
‘बहुत कष्ट सहे तुमने। तुम्हारी बहुत याद आई। डटे रहने के लिए शुक्रिया।’
मानो उसके चेहरे का भाव यही कह रहा था।
हम चारों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया।
मैं फिर कभी उनसे बिछुड़ना नहीं चाहता था।
नए सिरे से मिले इस समय के लिए मैं कृतज्ञ था।
मैं जीवन को और बेहतर ढंग से जीना चाहता था।
हवाई अड्डे से निकलकर हम सब साथ कार में बैठे।
घर जाते हुए पत्नी ने कहा,
“अब तो लगता है, भारत में हमारा घर ही अपना वतन है।”
उसकी यह बात सुनकर मेरा मन कृतज्ञता से भर गया।
मैं सोचता था कि शायद भारत से उसकी यादों में केवल तकलीफें ही जुड़ी होंगी। लेकिन जिस घर में हम साथ रहते थे, उसे वह अपना वतन मानती थी।
हम फिर एक बार साथ घर लौट रहे थे।
बीते दिनों को शब्दों और तस्वीरों में सहेजता हूँ।
लेखन: येओउन
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