
मुझे बारिश पसंद है।
सिर्फ थोड़ी-बहुत नहीं, बहुत पसंद है।
बारिश शुरू होते ही न जाने क्यों मन खिल उठता है।
खिड़की के बाहर गिरती बूँदों को देखकर ही मन खुश हो जाता है, और बारिश की आवाज़ सुनते ही जो भी कर रहा होता हूँ, उसे रोककर खिड़की के बाहर देखने लगता हूँ।
कभी-कभी तो लगता है, कहीं मैं बारिश के लिए पागल तो नहीं।
बारिश होती है तो कहीं निकल जाने का मन करता है।
मन करता है कि गाड़ी लेकर बारिश में निकल पड़ूँ, या बड़ी-बड़ी खिड़कियों वाले किसी कैफ़े में बैठकर बरसते पानी को निहारते हुए कॉफ़ी पिऊँ।
किताब खोलकर, बारिश की आवाज़ सुनते हुए वक़्त बिताना भी अच्छा लगता है।
बारिश के दिनों में लगता है जैसे रोज़मर्रा की दुनिया से अलग किसी और दुनिया में आ गया हूँ।
आख़िर कब से मुझे बारिश इतनी पसंद है?
यादों की डोर थामकर पीछे जाता हूँ तो बचपन के एक बरसात के मौसम तक पहुँचता हूँ।
शायद मैं छह साल का रहा होऊँगा।
तब मैं ग्योंगगी प्रांत के यांगजू के एक देहाती गाँव में अपने दादा-दादी के साथ रहता था।
मैं डोकबावी चर्च के चलाए हुए एक बाल विद्यालय में जाता था। घर से वहाँ तक एक छोटे बच्चे के क़दमों से चलने में एक घंटे से कुछ ज़्यादा लगता था।
मैं उस रास्ते पर अकेले ही आया-जाया करता था।
बरसात में मैं पीला रेनकोट पहनता था।
रोपाई के बाद धान के खेतों में नन्हे पौधे हरे-भरे उग रहे थे।
बारिश से खेतों में पानी लबालब भरा था और उनके बीच से एक घुमावदार रास्ता जाता था, जो बस इतना चौड़ा था कि एक कार निकल सके।
मैं उस रास्ते पर छोटे-छोटे तेज़ क़दमों से चलता था।
पीले रेनकोट में एक हुड लगा था। उसके आगे पारदर्शी प्लास्टिक की एक छोटी खिड़की थी, जिससे हुड पहनकर भी सामने देखा जा सकता था।
उस प्लास्टिक की खिड़की पर बारिश की बूँदें जम जाती थीं।
कुछ बूँदें वहीं टँगी रहतीं, तो कुछ प्लास्टिक पर फिसलकर नीचे बह जातीं।
टप, टपटप, टप।
सिर के ऊपर रेनकोट पर पड़ती बूँदों की आवाज़ सुनाई देती थी।
खेतों के बीच की छोटी-सी नाली में पानी बहता था।
रेनकोट पर पड़ती बारिश की आवाज़ में पानी की कलकल भी घुल जाती थी।
बरसात का आसमान कुछ अँधेरा था।
लेकिन उस दिन की हवा मुझे अच्छी लगती थी।
रेनकोट से बाहर निकले हाथों की पीठ और चेहरे पर बारिश की बूँदें पड़ती थीं।
छोटी-छोटी बूँदें त्वचा को छूकर नीचे बह जातीं।
थोड़ी देर बाद कोई दूसरी बूँद उसी जगह से गुज़रती।
गुदगुदी होती थी।
हवा में हल्की ठंडक थी, लेकिन सर्दी नहीं लग रही थी।
बल्कि सब कुछ शीतल और ताज़गी भरा लग रहा था।
इस तरह बारिश में भीगते हुए चलना मुझे अच्छा लगता था।
रास्ता अकेले तय करता था, पर न अकेलापन लगता था, न डर।
घुमावदार रास्ते पर चलना भी मज़ेदार था और यह जानना भी अच्छा लगता था कि उसके छोर पर मेरे दोस्त और शिक्षक हैं।
बाल विद्यालय पहुँचने का दृश्य मुझे याद नहीं।
मेरी याद में बस पीला रेनकोट पहने धान के खेतों के बीच छोटे-छोटे तेज़ क़दमों से चलता एक बच्चा रह गया है।
प्राथमिक विद्यालय में जाने के बाद, फिर मिडिल स्कूल और हाई स्कूल में भी मुझे बारिश पसंद रही।
बारिश के दिनों में छाता होने पर भी मैं जानबूझकर उसे नहीं खोलता था।
बारिश की बूँदों से चेहरा, बाल और कंधे भीग जाते, कपड़े गीले हो जाते, फिर भी मुझे बुरा नहीं लगता था।
सीलन या असहजता से कहीं ज़्यादा मुझे ठंडक और ताज़गी महसूस होती थी।
बारिश से बचना मुझे दुनिया से बचने जैसा लगता था।
बारिश से भरी दुनिया में अपने पूरे तन से उतर जाने का एहसास मुझे अच्छा लगता था।
शुरुआत तो बस बारिश से प्यार के कारण हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे बारिश में भीगना मेरी अपनी एक ख़ुशी बन गया था।
समय बीत गया।
अब बारिश होने पर पहले की तरह छाता ठुकराकर नहीं चलता।
कभी तेज़ बारिश वाले दिनों का ख़याल करके रेनकोट भी खरीद लेता हूँ।
एक बार ऐसा भी हुआ कि उसे पहनने का मौक़ा ही नहीं मिला और भारत जाने से पहले सामान समेटते हुए उसे फेंक दिया।
सोचता हूँ तो कुछ हँसी आती है।
बारिश इतनी पसंद है, फिर भी नया रेनकोट एक बार भी ठीक से पहन नहीं पाया।
क्या बड़ा होते-होते वह एहसास थोड़ा घिस गया है?
अब जब बारिश होती है तो मन करता है किसी बड़ी खिड़कियों वाले कैफ़े में जाकर कॉफ़ी पीते हुए बारिश की आवाज़ सुनूँ। कभी-कभी बस बाहर निकलकर बारिश में भीगने का मन भी करता है।
ऐसे में पीला रेनकोट पहने, धान के खेतों के बीच छोटे-छोटे तेज़ क़दमों से चलता अपना बचपन याद आ जाता है।
मुझे आज भी बारिश पसंद है।
बस बारिश का आनंद लेने और उसके साथ खेलने का तरीक़ा बदल गया है।
बीते दिनों को शब्दों और तस्वीरों में सहेजता हूँ।
लेख: येओउन
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